मेरा बेटा खो गया है.
ऐ दुनिया वालो,
यहीं कहीं, मेरा बेटा खो गया है.
रोज बदलती, दुनिया की इस चकाचौंध में,
शायद कहीं, भटक गया है.
हो सके तो कोई ढूंढ कर ला दे.
बदले में, चाहे तो सारी कमाई ले ले.
बडे यत्न से, पाला है उसे,
जैसे, सभी मां-बाप करते हैं.
आंखों से नींद, और मन का चैन,
जैसे रुठ गया है.
मेरा बेटा खो गया है.
मां-पापा का राजदुलारा,
मम्मी की आंखों का तारा,
कभी दीपू है, कभी सोना है.
सपनों को जैसे पहना है.
कभी देवकी का कान्हा,
तो कभी त्रेता का श्रवणकुमार.
पथराई आंखों से बहता पानी,
कह रहा है अनकही कहानी
न था कभी सोचा,
पड जायेगा सपनों का टोटा.
दूर हो जायेगा, मेरा अपना बेटा.
सपने, जो लगता था, सच हो गये.
अचानक ऐसा क्या हो गया है ?
आज मेरा बेटा खो गया है.
बहुत भोला और मासूम सा चेहरा.
आग्य़ाकारी, आत्मविश्वास का मोहरा.
फिर भी न जाने, किस बहकावे में,
या बदली सोच के वश में,
रेगिस्तान की मर्गमरीचिका की तरह,
किंकर्तव्यविमूढ हुआ, कुछ भूल गया है.
विदेशी संस्कर्ति की घुसपैठ,
भारी पड रही है, रिश्तों पर.
लगा हो जैसे गर्हण सपनों पर.
हम से भी जाने - अनजाने,
शायद कुछ भूल हो गयी.
सब गडबडा गया है.
मेरा बेटा खो गया है.
बेटा भी वहां खोया,
जहां उम्मीद न थी
हम तो लगभग आश्वस्त थे.
बेटा अब जवान हो चला है.
पढाई में अव्वल,
काम भी मन - माफिक.
हमें और चाहिये क्या ?
अब दिन बदलेंगे.
सपने सच होंगे.
इसी बीच, मां-पा को खबर लगी,
जवान बेटा कहीं खो गया है.
हम पर तो, जैसे पहाड ही टूट पडा.
सुनहरे सपने, क्षण में बिखर गये.
सांसें न जाने, रुक सी गयीं.
हम अपने से, अपने को छुपा कर,
एक दूसरे को समझा रहे हैं.
मेरा बेटा खो गया है.
बेटे के बचपन की मधुर यादें,
वो बीते, गौरवपूर्ण पल,
क्या सचमुच धोखा था ?
नहीं, कदापि नहीं.
शायद, यह धोखा है.
हमें भरोसा है, समय बदलेगा.
फिर लौटेंगे वे, सोने से दिन.
चांदी सी रातें.
लगता है, आवाज आई,
हैलो मौंम, पापा जी नमस्ते.
सोचा, शायद मन का भर्म है. नहीं.
सामने बेटा, चरण-स्पर्श के लिये झुका.
मैंने उठ, तुरन्त सीने से लगा लिया.
आज मुझे, खोया बेटा ही नहीं,
दुनिया की सबसे बडी दौलत मिल गयी.
आज मुझे, मेरा बेटा मिल गया.
--- ० ---
Thursday, May 13, 2010
Thursday, December 31, 2009
nav varsh ka abhinandan
नव वर्ष का अभिनन्दन.
२०१०
नव वर्ष का है अभिनन्दन, अभिनव वन्दन.
मंगलमय हो वर्ष - सन दो हजार दस.
ढेरों खुशियां लाये, हो चहुं ओर शांति.
आशायें हों फलीभूत,शान्ति ही बने क्रान्ति.
एक बनें सब देश, भुला कर द्वेष.
मंगल ही मंगल हो, भू मंडल पर शेष.
मां का आंचल स्वर्ग बने, ना बच्चा रोये.
तन पर कपडा, भूखे पेट ना कोई सोये.
सभी धर्म - सम्प्रदाय बराबर, बैर ना होये.
शिक्षा का प्रसार-बने हथियार, ग्य़ान जो होये.
आतंकवाद की बडी चुनौती, निबटा लेंगे.
पर्यावरण बचा, हम सब को बचा ही लेंगे.
जीवन - कविता के मधुर बोल.
घर - आंगन गूंजें डोल डोल.
कोयल की मीठी कूक बने.
अल - सुभह जगाये, गीत बने.
जन जन से दूर, नफरत-बदबू.
हर ओर बहे, भीनी - खुशबू.
--- ० ---
२०१०
नव वर्ष का है अभिनन्दन, अभिनव वन्दन.
मंगलमय हो वर्ष - सन दो हजार दस.
ढेरों खुशियां लाये, हो चहुं ओर शांति.
आशायें हों फलीभूत,शान्ति ही बने क्रान्ति.
एक बनें सब देश, भुला कर द्वेष.
मंगल ही मंगल हो, भू मंडल पर शेष.
मां का आंचल स्वर्ग बने, ना बच्चा रोये.
तन पर कपडा, भूखे पेट ना कोई सोये.
सभी धर्म - सम्प्रदाय बराबर, बैर ना होये.
शिक्षा का प्रसार-बने हथियार, ग्य़ान जो होये.
आतंकवाद की बडी चुनौती, निबटा लेंगे.
पर्यावरण बचा, हम सब को बचा ही लेंगे.
जीवन - कविता के मधुर बोल.
घर - आंगन गूंजें डोल डोल.
कोयल की मीठी कूक बने.
अल - सुभह जगाये, गीत बने.
जन जन से दूर, नफरत-बदबू.
हर ओर बहे, भीनी - खुशबू.
--- ० ---
Tuesday, October 27, 2009
रोटी का टुकडा
१-रोटी के एक टुकडे,
की आस में,
गरीब के मासूम बेटे,
की खामोश निगाहें,
पूछ रहीं थी एक सवाल.
क्या आप ?, हम,
दे पायेंगे उसे जबाब.
शायद नहीं !
इसीलिये वह बेचारा,
निराशा में मुंह फेर कर,
एक बार फिर,
मां के फटे-आंचल में,
असफल कोशिश में,मुंह छुपाने की,
फिर दूसरी ओर,
ताकने लगा.
शायद अबकी बार,
कहीं से, रोटी का,
सिर्फ एक टुकडा,
हाथ में आ जाये.
बस ! और कुछ नहीं,
सिर्फ, रोटी का एक टुकडा.
२-दुकान से लौट कर,
सेठ जी ने ज्यों ही,
रोटी का पहला टुकडा,
बेमन से, मुंह में डाला.
स्वाद को कसैला बना,
चीख पडे !
फिर वही सब्जी ?
कितनी बार कहा है,
मुझे गोभी पसन्द नहीं.
बेचारी नौकरानी !
क्या करती ? डर गयी.
लेकिन मालिक !
यह तो पत्ता-गोभी है.
सेठ जी गरज उठे,
हरामजादी, बेहया.
जबान लडाती है.
कितनी बार समझाया.
लेकिन फिर वही !
लगता है तुझे,
सबक सिखाना ही पडेगा.
जल्दबाजी में उठे,
चूल्हे पर भगौने में,
खौलता पानी,
नौकरानी पर उंडेल दिया.
बेबस लडकी की चीत्कार,
फैंकी-रोटी के,
चन्द टुकडों में दब गयी.
---०---
१-रोटी के एक टुकडे,
की आस में,
गरीब के मासूम बेटे,
की खामोश निगाहें,
पूछ रहीं थी एक सवाल.
क्या आप ?, हम,
दे पायेंगे उसे जबाब.
शायद नहीं !
इसीलिये वह बेचारा,
निराशा में मुंह फेर कर,
एक बार फिर,
मां के फटे-आंचल में,
असफल कोशिश में,मुंह छुपाने की,
फिर दूसरी ओर,
ताकने लगा.
शायद अबकी बार,
कहीं से, रोटी का,
सिर्फ एक टुकडा,
हाथ में आ जाये.
बस ! और कुछ नहीं,
सिर्फ, रोटी का एक टुकडा.
२-दुकान से लौट कर,
सेठ जी ने ज्यों ही,
रोटी का पहला टुकडा,
बेमन से, मुंह में डाला.
स्वाद को कसैला बना,
चीख पडे !
फिर वही सब्जी ?
कितनी बार कहा है,
मुझे गोभी पसन्द नहीं.
बेचारी नौकरानी !
क्या करती ? डर गयी.
लेकिन मालिक !
यह तो पत्ता-गोभी है.
सेठ जी गरज उठे,
हरामजादी, बेहया.
जबान लडाती है.
कितनी बार समझाया.
लेकिन फिर वही !
लगता है तुझे,
सबक सिखाना ही पडेगा.
जल्दबाजी में उठे,
चूल्हे पर भगौने में,
खौलता पानी,
नौकरानी पर उंडेल दिया.
बेबस लडकी की चीत्कार,
फैंकी-रोटी के,
चन्द टुकडों में दब गयी.
---०---
Sunday, October 18, 2009
vilupta hue daynosore.
विलुप्त हुए डायनोसोर.
बात बहुत प्राचीन, स्रष्टी की शुरुवात में.
गिने-चुने थे जीव, बनस्पति बहुतायत में.
सभी जीव, स्वच्छन्द, निरंकुश जीवन-व्यापन.
अपनी-अपनी चिन्ता थी, ढूंढें अपनापन.
सभी डरे, भयभीत, कहीं से खोजें भोजन.
भरें पेट, कैसे भी, कहीं भी,सब-कुछ भोजन.
जीवो: जीवश्य भोजनम. को सिध्दान्त बनाया.
ताकि भरें पेट कुछ, कुछ का जीवन खाया.
प्रक्रती का यह चक्र, जीवन-विकास था.
किसी एक की मौत, दूसरे का जीवन था.
लुका-छिपी का खेल, खेलते थे जंगल में.
कौन बनेगा ग्रास, किसी का, भूखेपन में.
फिर भी हुआ, विकास-चक्र गति पाई.
बडे जीव धरती पर आये, छोटों ने संख्या बढाई.
जीवन की आपा-धापी में, कुछ ने बढत बनाई.
थे अब भी भयभीत सभी, पर जीवन-जोत जगाई.
समय-चक्र ने पलटा खाया, डायनोसोर-युग आया.
था अब तक का विशालतम प्राणी, आधिपत्य जमाया.
डायनोसोर, निर्विरोध, निरंकुश, प्रथ्वी के राजा थे.
जहां भी जाते, तबाही मचाते, डरे सभी प्राणी थे.
बहुत समय तक चला यही सब, तांडव डायनोसोर का.
आपस में टकराव बढा, बन झगडा डायनोसोर का.
कम ताकतवर मारे गये, थी संख्या लगी घटने.
थे कुछ और भी कारण, अब हालात लगे बिगडने.
समय बदलता रहा, अकाल ने डेरा डाला.
ना पानी, ना बनस्पति, जिसने जीवों को पाला.
त्राही-त्राही सब ओर, मर रहे थे प्राणी बिन-मौत.
जिन्दा प्राणी, लाशों को खा, भगा रहे थे मौत.
डायनोसोर भी शामिल इनमें, बेचारे लाचार.
पेड-पौधे भी खत्म, जो अब तक, थे जीवन-आधार.
कुछ वैग्यानिक कहते, कुछ घटनायें भी थी जिम्मेदार.
इस प्रथ्वी पर तभी भयानक, विस्फोट हुए बारंबार.
चारों तरफ, धुंआ और लावा, ज्वालामुखियों ने फैलाया.
दिन-दोपहर, हुई रात भयानक, अन्धकार था छाया.
आक्सीजन हुई खत्म, धरा पर, जीवन शेष न पाया.
प्रलय हुई सम्पूर्ण, कुछ नही बचा, न कोई साया.
डायनोसोर विलुप्त हुए, प्रथ्वी के राजा - रानी.
समय-चक्र था घूम गया, बस यही कहानी.
समय समय की बात, समय सब से बलशाली.
बदला समय, मिले मिट्टी में, थे जो गौरवशाली.
--- ० ---
बात बहुत प्राचीन, स्रष्टी की शुरुवात में.
गिने-चुने थे जीव, बनस्पति बहुतायत में.
सभी जीव, स्वच्छन्द, निरंकुश जीवन-व्यापन.
अपनी-अपनी चिन्ता थी, ढूंढें अपनापन.
सभी डरे, भयभीत, कहीं से खोजें भोजन.
भरें पेट, कैसे भी, कहीं भी,सब-कुछ भोजन.
जीवो: जीवश्य भोजनम. को सिध्दान्त बनाया.
ताकि भरें पेट कुछ, कुछ का जीवन खाया.
प्रक्रती का यह चक्र, जीवन-विकास था.
किसी एक की मौत, दूसरे का जीवन था.
लुका-छिपी का खेल, खेलते थे जंगल में.
कौन बनेगा ग्रास, किसी का, भूखेपन में.
फिर भी हुआ, विकास-चक्र गति पाई.
बडे जीव धरती पर आये, छोटों ने संख्या बढाई.
जीवन की आपा-धापी में, कुछ ने बढत बनाई.
थे अब भी भयभीत सभी, पर जीवन-जोत जगाई.
समय-चक्र ने पलटा खाया, डायनोसोर-युग आया.
था अब तक का विशालतम प्राणी, आधिपत्य जमाया.
डायनोसोर, निर्विरोध, निरंकुश, प्रथ्वी के राजा थे.
जहां भी जाते, तबाही मचाते, डरे सभी प्राणी थे.
बहुत समय तक चला यही सब, तांडव डायनोसोर का.
आपस में टकराव बढा, बन झगडा डायनोसोर का.
कम ताकतवर मारे गये, थी संख्या लगी घटने.
थे कुछ और भी कारण, अब हालात लगे बिगडने.
समय बदलता रहा, अकाल ने डेरा डाला.
ना पानी, ना बनस्पति, जिसने जीवों को पाला.
त्राही-त्राही सब ओर, मर रहे थे प्राणी बिन-मौत.
जिन्दा प्राणी, लाशों को खा, भगा रहे थे मौत.
डायनोसोर भी शामिल इनमें, बेचारे लाचार.
पेड-पौधे भी खत्म, जो अब तक, थे जीवन-आधार.
कुछ वैग्यानिक कहते, कुछ घटनायें भी थी जिम्मेदार.
इस प्रथ्वी पर तभी भयानक, विस्फोट हुए बारंबार.
चारों तरफ, धुंआ और लावा, ज्वालामुखियों ने फैलाया.
दिन-दोपहर, हुई रात भयानक, अन्धकार था छाया.
आक्सीजन हुई खत्म, धरा पर, जीवन शेष न पाया.
प्रलय हुई सम्पूर्ण, कुछ नही बचा, न कोई साया.
डायनोसोर विलुप्त हुए, प्रथ्वी के राजा - रानी.
समय-चक्र था घूम गया, बस यही कहानी.
समय समय की बात, समय सब से बलशाली.
बदला समय, मिले मिट्टी में, थे जो गौरवशाली.
--- ० ---
Friday, October 16, 2009
aao sab-mil deep jalaaye.
आओ सब मिल, दीप जलायें
आओ सब मिल, दीप जलायें.
दीपावलि यादगार मनायें.
शिक्षा का उजियारा फैले,
घर-घर विद्या-दीप जलायें.
बेटा-बेटी, सब हैं बराबर,
समान अवसर, पालन-पोषण.
आगे बढें, पढें, अन्वेषण.
अनपढ-शाप, से मुक्ति दिलायें.
आओ सब मिल दीप जलायें.
सभी धर्म, सम्प्रदाय बराबर.
ऊंच-नीच, सब हैं आडम्बर.
सबको अवसर, सबका हक है,
भेद-भाव, झगडा नाहक है.
अब हम नई शुरुवात करेंगे,
मिल-जुल, मसले निबटा लेंगे.
भाई-चारा, हमारा नारा.
मानवता का पाठ पढायें.
आओ सब मिल दीप जलायें.
हम हों किसी प्रदेश के वासी,
या कोई भी, भाषा- भाषी.
रंग-रूप, खान-पान, अलग हों,
मौसम या घर-द्वार अलग हों.
सब हैं भारत-मां को प्यारे.
मां की रक्षा धर्म हमारा.
हम सब एक हैं, देश हमारा.
भारत-मां को शीश नवायें,
आओ सब मिल दीप जलायें.
--- ० ---
आओ सब मिल, दीप जलायें.
दीपावलि यादगार मनायें.
शिक्षा का उजियारा फैले,
घर-घर विद्या-दीप जलायें.
बेटा-बेटी, सब हैं बराबर,
समान अवसर, पालन-पोषण.
आगे बढें, पढें, अन्वेषण.
अनपढ-शाप, से मुक्ति दिलायें.
आओ सब मिल दीप जलायें.
सभी धर्म, सम्प्रदाय बराबर.
ऊंच-नीच, सब हैं आडम्बर.
सबको अवसर, सबका हक है,
भेद-भाव, झगडा नाहक है.
अब हम नई शुरुवात करेंगे,
मिल-जुल, मसले निबटा लेंगे.
भाई-चारा, हमारा नारा.
मानवता का पाठ पढायें.
आओ सब मिल दीप जलायें.
हम हों किसी प्रदेश के वासी,
या कोई भी, भाषा- भाषी.
रंग-रूप, खान-पान, अलग हों,
मौसम या घर-द्वार अलग हों.
सब हैं भारत-मां को प्यारे.
मां की रक्षा धर्म हमारा.
हम सब एक हैं, देश हमारा.
भारत-मां को शीश नवायें,
आओ सब मिल दीप जलायें.
--- ० ---
Wednesday, October 14, 2009
ये भी क्या दीवाली है ?
दीवाली का मौसम आये,
दिए, मिठाई,खुशियां लाये.
बाजारों की रौनक गायब,
बच्चों में उत्साह नहीं.
कमर तोड दी मंहगाई ने,
चाह तो है पर राह नहीं.
घर की थाली, खाली है.
ये भी क्या दीवाली है ?
दीवाली की बात अधूरी,
रिश्तों में मिठास नहीं.
भाई ही भाई का दुश्मन,
गैरों की तो बात नहीं.
गले-मिलना, है रिवाज पुराना,
चरण-स्पर्श, का गया जमाना.
हाय-हलो, की बोली है.
ये भी क्या दीवाली है ?
दीवाली, दीपों की पंक्ति,
लडियां हैं, पर दिए नहीं
जहर बने हैं, दूध, मिठाई,
नकली-माल की कमी नहीं.
प्लास्टिक- फूलों, से है शोभा,
मिट्टी की सोंधी-महक नहीं.
गुजिया, बाजार वाली है.
ये भी क्या दीवाली है ?
शोर-शराबा और हुडदंग,
दीवाली का नया रंग.
पटाखे घोल रहे, जहर हवा में,
आग लगे, जैसे नोटों में.
लेना सांस, हुआ दुश्वार,
बच्चे, बूढे, सब परेशान.
पर्यावरण की होली है,
ये भी क्या दीवाली है ?
--- ० ---
दीवाली का मौसम आये,
दिए, मिठाई,खुशियां लाये.
बाजारों की रौनक गायब,
बच्चों में उत्साह नहीं.
कमर तोड दी मंहगाई ने,
चाह तो है पर राह नहीं.
घर की थाली, खाली है.
ये भी क्या दीवाली है ?
दीवाली की बात अधूरी,
रिश्तों में मिठास नहीं.
भाई ही भाई का दुश्मन,
गैरों की तो बात नहीं.
गले-मिलना, है रिवाज पुराना,
चरण-स्पर्श, का गया जमाना.
हाय-हलो, की बोली है.
ये भी क्या दीवाली है ?
दीवाली, दीपों की पंक्ति,
लडियां हैं, पर दिए नहीं
जहर बने हैं, दूध, मिठाई,
नकली-माल की कमी नहीं.
प्लास्टिक- फूलों, से है शोभा,
मिट्टी की सोंधी-महक नहीं.
गुजिया, बाजार वाली है.
ये भी क्या दीवाली है ?
शोर-शराबा और हुडदंग,
दीवाली का नया रंग.
पटाखे घोल रहे, जहर हवा में,
आग लगे, जैसे नोटों में.
लेना सांस, हुआ दुश्वार,
बच्चे, बूढे, सब परेशान.
पर्यावरण की होली है,
ये भी क्या दीवाली है ?
--- ० ---
Monday, October 12, 2009
त्यौहारों का मौसम आया,
ईद, दशहरा और दीवाली.
लेकिन फिर भी जोश नही है,
जेबैं खाली, थाली खाली.
प्याज रुलाती थी पहले भी,
अब आलू भी साथ हो लिये.
सब्जि मंहगी हो गयी इतनी,
आम-आदमी कैसे जिये ?
चीनी मंहगी, दालें मंहगी,
दूध, तेल की बात करें क्या ?
रोज मजूरी, तब हो खाना,
वो बेचारे, अब खायें क्या ?
ऎसे में त्यौहार आ गये,
कुछ कडवा, कुछ नीम-चढा.
अब ऊपर वाला ही मालिक,
खत्म हुआ, घर में जो पडा.
जमाखोर, कालाबाजारी, मिली-भगत.
मौज उडा रहे, बिचौलिये.
वसूल रहे हैं, दो के दस,
दुकानदार बन सुभाषिये.
बेबस जनता, तमाशबीन सरकार.
फरियाद किसे, कहां पुकार ?
दिखाई ना दे, जनता पर जुल्म,
कौन जगाये, सोई सरकार ?
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